*फ्लाईट से उड़ेगी…: एक ताने से जागी स्त्री की सोई हुई शक्ति और नई उड़ान की कहानी*

*फ्लाईट से उड़ेगी…: एक ताने से जागी स्त्री की सोई हुई शक्ति और नई उड़ान की कहानी*


' फ्लाईट से उड़ेगी ' ये वाक्य थोड़े ध्यान केंद्रित करने के साथ जब कोई उम्र दराज महिला युवा महिला को कहे। इस वाक्य से मुझे याद आ गया हनुमान को भी उनके बल को याद दिलाया गया । यह 'का चुप साधि रहा बलवाना' बोलने मात्र से शरीर में ऊर्जा और रोमांच दोनों की स्फूर्ति एक साथ प्लावित होने लगा। मुझे मेरा बल याद दिलाने के लिए और मै भविष्य में इस बल के माध्यम से सम्पूर्ण संसार को प्रकाश में लाने मे सहायक बन सकूगी। मेरी पूरी इंद्रिय और मेरी शक्ति जो सूर्य के उजाले मे खो गई थी वह उस शाम के प्रहर मे वापस मेरी सोई शक्तियाँ जागृत करने और मुझे सृजन चेतना के लिए पूरी निष्ठा लगानी पड़ जायेगी मै लगा दूँगी ये मेरा अहम नही है मेरी चेतना है जो अभी तक सूर्य के प्रकाश रूपी सहारे की राह देख रही थी। वैसे ये वायुयान की सवारी के लिए कौन विवाह करता है। इस कहे गए वाक्य में किसी महिला की विवशता और सम्पूर्ण इच्छाएं झलकने लगी जैसे कोई भी इच्छा उस महिला की पूरी नही हुई । और यही उसकी सबसे बड़ी कुंठा जिसके साथ जीवन यापन करने हेतु बाध्य है। इच्छा शब्द का प्रयोग इसलिए कर रही हूँ आकांक्षा का पर्यायवाची शब्द के लिए उचित है यह महिला के अहम को तोड़ रही है। मेरी सोच भी कि उस महिला की विवशता उसकी कोई आकांक्षा पूरी तो नही हुई ऐसा मेरा मानना है इसलिए इस महिला को आकांक्षा शब्द से नफरत है और उसके पुत्र की महत्वा आकांक्षा इतनी उच्च है उसे उतना ही प्रेम है लेकिन मां के सामने लाचार पुत्र । जितना इन्होंने मुझे उपेक्षित करने मे अपना दिमाग लगाया और कितनी साजिशे इन्होंने किया इसका प्रमाण ये खुद पोषित कर रही है। हाय ये शब्द निषेध होने के साथ जितना आधुनिक समय मे इसका प्रयोग जेन जी कर रही है यह देखने लायक है। इसकी हालत ऐसी ही है दाया पैर आधुनिक और बांया पैर परम्परा में हमेशा खड़ा मिलता है। जब इंसान असफल होने लगता है तो परम्पराओं में दौड़ लगाता है और जब सफल तो वह आधुनिक दौड़ मे खुद शामिल कर लेता है, इन सब के बीच व्यवहारवाद झूला झूलता मिलता है। खैर ,आइये मुद्दे की बात करते है महिला एक ऐसी इंसान जिसके माध्यम से संस्कार पोषित होता है और महिला माँ, माता हमेशा पूज्यनीय होती है। पुत्र माता के चारों तरफ की वृत्ति मे गोल - गोल घूमता रहता है इसलिए जब तक माँ है पुत्र उसी दायरे मे घूमेगा इसलिए चिंता की बात यहाँ खत्म हो गई जहाँ मां वहाँ पुत्र , पुत्र को समीप पाकर माँ गर्व से मंडित होकर इति से अति पर आकर अपना पतन करने मे आगे आ जाती है। 

इन सबसे परे बेहद चिंता और चिंतन की बात है माँ पहले आती है या पत्नी बहुत ही गम्भीर चिंतन है। स्त्री कितना पति से स्नेह करती है ये बहुत रोचक है यही परम्परा पति- पुत्र दोनों के बीच स्त्री अपने सपने को पूरा करने के लिए कुल का नाम लेकर संचयन करने लगती है । इसी निर्माण मे वह भूल जाती है की वह एक स्त्री है और स्त्री का सम्मान करना उसका धर्म है और प्रथम कर्तव्य भी। लेकिन माँ यह शब्द जितना छोटा है उतना ही गम्भीर और भाव लिए हुए बच्चे के आने के बाद वह सिर्फ माँ ही होती है। इसी के बीच उसका पूरा व्यक्तित्व समाप्त होकर बच्चा और बच्चा यदि पुत्र है उससे उसकी सुरक्षा और उसके जीवन के सभी निर्णय स्त्री अपने हांथो मे ले लेती है । यही उसके विनाश की पहली सीढ़ी शुरू हो जाती है। सम्पूर्ण संसार 'राम ' को आदर्श मानता है लेकिन राम की सभी माता रानिया होकर भी कही कोई हस्तकक्षेप नही की।' राम' गए गुरु के पास विद्दया सीखने और वापस आये गृहस्थ काल मे पत्नी के साथ। राम की सभी माताएं हर्षित होकर स्वागत के लिए आतुर हो गई जबकि सीता धरती पुत्री थी । अयोध्यावासी आज यह सब भूल गए । पुत्र मोह मे महाभारत और अति पुत्र मोह मे राम का सम्पूर्ण जीवन ये धार्मिक कथाएँ जिनसे हमे नीति, विचार और सम्पूर्ण जीवन के उचित कार्यो में बाधा न बनकर प्रगति मे सहायक होते है। आइये वायुयान की बात करते है, वायुयान से आना बहुत कठिन नही रहा इस आधुनिक समय में लेकिन कहने वाली स्त्री के लिए जरुर कठिन है। शायद उसके घुटने का दर्द पुत्र की आर्थिक स्थिति या वायुयान में बैठना उसके लिए यमलोक का द्वार खोल दे। फिर उसके बनाये छोटे से घर में उसका अस्तित्व खत्म न हो जाये और कुर्सी पर कोई अन्य महिला न आ जाये। उसे इस बात की चिंता सबसे ज्यादा है। इस व्यवहार जगत मे और आकर्षण से भरी दुनिया में अब मै बिना किसी बाधा के उड़ान भरने के लिए चल पड़ी मेरी पहली यात्रा वायुयान की भविष्य तय करेगी क्योंकि अधिकांश भारतीय भगवान भरोसे है और मै भी भगवान के भरोसे भगवान ने ही मुझे भी बेटी से बहन और पत्नी बनने आशीर्वाद दे चुका है और अब बारी है माँ की यह भगवान भरोसे है। जैसे मुझे स्त्री के तीन पद दे चुके है वैसे इस भारीभरकम पद को भी देगे। पवन पुत्र को सौंपकर मै भी मुक्त हो गई हूँ। पवन पुत्र ही मेरे पति को वायुयान द्वारा वायुमार्ग से मस्तक भाल पर सूर्य की लालिमा मेरी मांग पर सौभाग्य और मंगल सूचक पक्ति में लाकर मुझे स्थान दिया । अतीत से जीवन की दिशा दीप्ति होती है। उस महिला के ताने भरे वाक्य मेरे लिए कर्म और प्रगति और सम्मान का धोतक बन कर स्वागत के लिए अपनी पलके बिछाकर नवजीवन के इंतजार में है । मै चली...... फिर मिलेंगे कुछ ऐसी यादों के साथ यादें कभी खत्म नही होती। फ्लाईट ( वायुयान)का समय हो गया ... 

हनुमान चालीसा की पुस्तक और पवन पुत्र का आशीर्वाद। 

सब मंगल ही मंगल। 


डॉ. आकांक्षा मिश्रा

स्वतंत्र लेखिका

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